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अमर लता

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……….!!ग़ज़ल!!………..

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……………….. !! ग़ज़ल !! …………………..
*
ओढ़कर शब उदासी की वह करवट बदल रही होगी
बेखुदी में हूँ लेकिन रात अपनी भी ढल रही होगी
*
फूल ही फूल बिखरे हैं मेरी राहों में इस कदर
मुमकिन है वो कहीं काँटों पर चल रही होगी
*
उम्मीद के समंदर में डूबे हैं अरमां सारे
इक ख्वाहिश कहीं सीने में पल रही होगी
*
खाली नहीं सितारों से ये आसमाँ लेकिन
कमी इक चाँद की मावस में खल रही होगी
*
फूटी है किरन उम्मीदों की कहीं वो देखो
तीरगी से शायद रौशनी निकल रही होगी

© Amar Lata (Lucknow-India)

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